Kalidas

कालिदास संस्कृत भाषा के महान और नाटककार थे। कालिदास अपनी रचनात्मक विशेषताओं के कारण राष्ट्र की समग्र राष्ट्रीय चेतना को स्वर देने वाले कवि माने जाते हैं और कुछ विद्वान उन्हें राष्ट्रीय कवि का स्थान तक देते हैं।

कालिदास के जन्मस्थान के बारे में भी विवाद है। मेघदूतम् में उज्जैन के प्रति उनकी विशेष प्रेम को देखते हुए कुछ लोग उन्हें उज्ज्न का निवासी मानते हैं। साहित्यकारों ने ये भी सिद्ध करने का प्रयास किया है कि कालिदास का जन्म उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग जिले के कविल्ठा गांव में हुआ था।

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कालिदास का विवाह विद्योत्तमा नाम की राजकुमारी से हुआ। ऐसा कहा जाता है कि विद्योत्तमा ने प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई उसे शास्त्रार्थ में हरा देगा, वह उसी के साथ विवाह करेगी। जब विद्योत्तमा ने शास्त्रार्थ में सभी विद्वानों को हरा दिया तो हार को अपमान समझकर कुछ विद्वानों ने बदला लेने के लिए विद्योत्तमा का विवाह महामूर्ख व्यक्ति के साथ कराने का निश्चय किया। चलते चलते उन्हें एक वृक्ष दिखाई दिया जहां पर एक व्यक्ति जिस डाल पर बैठा था, उसी को काट रहा था। उन्होंने सोचा कि इससे बड़ा मूर्ख तो कोई मिलेगा ही नहीं। उन्होंने उसे राजकुमारी से विवाह का प्रलोभन देकर नीचे उतारा और कहा- “मौन धारण कर लो और जो हम कहेंगे बस वही करना”। उन लोगों ने स्वांग भेष दिलाकर विद्योत्तमा के सामने प्रस्तुत किया कि हमारे गुरु आप से शास्त्रार्थ करने के लिए आए है, परंतु अभी मौनव्रती हैं, इसलिए ये हाथों के संकेत से उत्तर देंगे। इनके संकेतों को समझ कर हम वाणी में उसका उत्तर आपको देंगे। शास्त्रार्थ प्रारंभ हुआ। विद्योत्तमा मौन शब्दावली में गूढ़ प्रश्न पूछती थी, जिसे कालिदास अपनी बुद्धि से मौन संकेतों से ही जवाब दे देते थे। प्रथम प्रश्न विद्योत्तमा ने किया संकेत में एक उंगली दिखा कर कि ब्रह्म एक है। परन्तु कालिदास ने समझा कि ये राजकुमारी मेरी एक आंख फोड़ना चाहती है। क्रोध में उन्होंने दो अंगुलियों का संकेत किया इस भाव से कि तू मेरी एक आंख फोड़ेगी तो मैं तेरी दोनों फोड़ दूंगा। लेकिन कपटियों ने उनके संकेत को कुछ इस तरह समझाया कि आप कह रही हैं कि ब्रह्म एक है लेकिन हमारे गुरु कहना चाहते हैं कि उस एक ब्रह्म को सिद्ध करने के लिए दूसरे (जगत्) की सहायता लेनी होती है।अकेला ब्रह्म स्वयं को सिद्ध नहीं कर सकता। राज कुमारी ने दूसरे प्रश्न के रूप में खुला हाथ दिखाया कि तत्व पांच है। तो कालिदास को लगा कि यह थप्पड़ मारने की धमकी दे रही है। उसके जवाब में कालिदास ने घूंसा दिखाया कि तू यदि मुझे गाल पर थप्पड़ मारेगी, मैं घूंसा मार कर तेरा चेहरा बिगाड़ दूंगा। कपटियों ने समझाया कि गुरु कहना चाह रहे हैं कि भले ही आप कह रही हो कि पांच तत्व अलग-अलग हैं पृथ्वी जल आकाश वायु अग्नि। परंतु यह तत्व प्रथक्-प्रथक् रूप में कोई विशिष्ट कार्य संपन्न नहीं कर सकते। परन्तु आपस में मिलकर एक होकर उत्तम मनुष्य शरीर का रूप ले लेते है जो जो ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है। इस प्रकार प्रश्न उत्तर से अंत में विद्युत तमा अपनी हार स्वीकार कर लेती है। फिर शर्त के अनुसार कालिदास और विद्योत्तमा का विवाह होता है। प्रथम रात्रि को ही जब दोनों एक साथ होते हैं उसी समय ऊंट की आवाज आती है तो संस्कृत में विद्योत्तमा पूछती है “किमेतत्” परंतु कालिदास संस्कृत जानते नहीं थे, इसीलिए उनके मुंह से निकल गया “ऊट्र” उस समय विद्योत्तमा को पता चला कि कालिदास अनपढ़ है। उसने कालिदास को धिक्कारा और यह कह कर घर से निकाल दिया कि सच्चे विद्वान् बने बिना घर वापिस नहीं आना।

कालिदास ने सच्चे मन से काली देवी की आराधना की और उनके आशीर्वाद से वे ज्ञानी और धनवान बन गए। ज्ञान प्राप्ति के बाद जब वे घर लौटे तो उन्होंने दरवाजा खड़का कर कहा – कपाटम् उद्घाट्य सुन्दरि! (दरवाजा खोलो, सुन्दरी)। विद्योत्तमा ने चकित होकर कहा — अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः (कोई विद्वान लगता है)।

इस प्रकार, इस किम्वदन्ती के अनुसार, कालिदास ने विद्योत्तमा को अपना पथप्रदर्शक गुरु माना और उसके इस वाक्य को उन्होंने अपने काव्यों में जगह दी। कहते हैं कि कालिदास की श्रीलंका में हत्या कर दी गई थी लेकिन विद्वान इसे भी कपोल-कल्पित मानते हैं।

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अन्नप्राशन संस्कार

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अन्नप्राशन संस्कार का महत्वअन्नप्राशन से पहले शिशु केवल मां का दूध पीता है, इसलिए इस संस्कार का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि यही वह समय होता है, जब शिशु मां के दूध के अलावा, पहली बार अन्न ग्रहण करता है। अन्नप्राशन को लेकर संस्कृत में एक श्लोक भी है ‘अन्नाशनान्मातृगर्भे मलाशाद्यपि शुद्धयति’ यानी मां के गर्भ में रहते हुए शिशु में मलिन भोजन के जो दोष आते हैं, उसका निदान करना चाहिए और शिशु को पोषण देने के लिए भोजन कराना चाहिए। बात की जाए शास्त्रों की, तो इनमें भी अन्नप्राशन का महत्व माना गया है।

कब करना चाहिए अन्नप्राशन संस्कार –

अन्नप्राशन संस्कार शिशु के छह या सात महीने का हो जाने पर किया जाता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि छह महीने तक शिशु सिर्फ मां का दूध पीता है। इसके अलावा, सातवें महीने तक शिशु हल्का भोजन पचाने में सक्षम हो जाता है। ऐसे में छठे या सातवें महीने में अन्नप्राशन करना शिशु की सेहत के लिहाज से भी फायदेमंद होता है। हालांकि, कहा जाता है कि लड़कों का अन्नप्राशन जन्म के छठे, आठवें या दसवें महीने में किया जाना चाहिए, जबकि लड़कियों का अन्नप्राशन पाचवें महीने में किया जाना चाहिए।

अन्नप्राशन कहां करना चाहिए –

आमतौर पर अन्नप्राशन संस्कार मंदिर में या घर में किया जाता है। आप विशेष आयोजन करके भी अन्नप्राशन संस्कार को संपन्न करा सकते हैं। इसका चयन आप अपनी परंपरा के अनुसार कर सकते हैं। आपको बता दें कि केरल में लोग अपने बच्चे का अन्नप्राशन हिंदुओं के प्रसिद्ध मंदिर गुरुवायूर में कराते हैं, तो वहीं मध्य भारत और उत्तर-पूर्वी भारत में लोग घर में ही अन्नप्राशन संस्कार संपन्न कराते हैं।

कैसे किया जाता है अन्नप्राशन संस्कार –

अन्नप्राशन संस्कार की शुरुआत में बच्चे को मामा की गोद में बिठाया जाता है और मामा ही उसे पहली बार अन्न खिलाते हैं। पहला निवाला खाने के बाद परिवार के अन्य सदस्य बच्चे को अन्न खिलाते हैं, दुआएं देते हैं और बच्चे के लिए उपहार भी लाते हैं। इस दौरान बच्चे के सामने मिट्टी, सोने के आभूषण, कलम, किताब और खाना रखा जाता है। इनमें से शिशु जिस पर हाथ रखता है, उसी से उसके भविष्य का अंदा्जा लगाया जाता है। ऐसी मान्यता है :

  • अगर बच्चा सोने के आभूषण पर हाथ रखे, तो माना जाता है कि वह भविष्य में धनवान रहेगा।
  • अगर बच्चा कलम पर हाथ रखे, तो वह बुद्धिमान होगा।
  • अगर बच्चा किताब पर हाथ रखे, तो वह सीखने में आगे रहेगा।
  • अगर बच्चा मिट्टी पर हाथ रखे, तो उसके पास संपत्ति होगी।
  • अगर बच्चा खाने पर हाथ रखे, तो वह दयावान होगा।

अन्नप्राशन के दौरान बच्चे को कैसा भोजन खिलाया जाता है?

भले ही यह शिशु का पहला भोजन हो, लेकिन इस रस्म में बच्चे के लिए कई तरह के व्यंजन बनाए जा सकते हैं। हालांकि, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप किस क्षेत्र से हैं और किस समुदाय से हैं। इस दौरान नीचे बताई गई चीजें शिशु को खिलाई जाती हैं :

  • दाल, सांबर या रसम
  • खीर

अन्नप्राशन संस्कार समारोह आयोजित करने के लिए टिप्स

अन्नप्राशन बच्चे के लिए बेहद खास समारोह होता है, लेकिन इस दौरान सुरक्षा के लिहाज से कुछ सावधानियां बरतने की जरूरत होती है। नीचे हम आपको अन्नप्राशन संस्कार से जुड़े कुछ खास टिप्स दे रहे हैं, जो आपके काम आएंगे :

  • अन्नप्राशन के दौरान बच्चे को खिलाते समय हमेशा साफ-सफाई का खास ध्यान रखें। ऐसे में जरूरी है कि उसे खिलाने वाला हर व्यक्ति अपने हाथों को ठीक से धोए, ताकि बच्चे को इन्फेक्शन न हो।
  • इस समारोह से पहले बच्चे को अच्छी तरह सुला दें, ताकि समारोह के दौरान वो नींद से चिड़चिड़ा न हो।
  • हमेशा बच्चे को मुलायम, आरामदायक और ढीले-ढाले कपड़े पहनाएं।
  • इस बात का ध्यान दें कि बच्चे के आसपास ज्यादा भीड़ न हो। ऐसे में बस अपने खास मेहमानों को ही न्योता दें।
  • अगर ठंड का मौसम है, तो बच्चे का एक स्वेटर हमेशा साथ में रखें। अगर उसे ज्यादा ठंड लगने लगे, तो पहना दें। वहीं, अगर गर्मियों का मौसम है, तो बच्चे के सूती कपड़े अपने पास रखें, ताकि जरूरत पड़ने पर उसके कपड़े तुरंत बदल सकें।
  • हमेशा आसपास नैप्किन और टिशू रखें, ताकि बच्चे को खिलाने के बाद उसका मुंह साफ करते रहें।
  • इसके अलावा, बच्चे को बीच-बीच में आराम भी कराती रहें, ताकि उसे थकान न हो। थकान होने पर बच्चा चिड़चिड़ा हो सकता है।
  • इस दौरान, आप अपने बच्चे को धुएं वाली जगह से दूर रखें। इससे उसकी आंखों में जलन हो सकती है।
  • इस पल को यादगार बनाने के लिए तस्वीरों की एल्बम बनवाना न भूलें।
  • यूं तो भले ही यह रस्म बच्चे को अन्न खिलाने की है, लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि उसे इतना ज्यादा न खिला दें कि उसका पेट खराब हो जाए। चूंकि, समारोह में मौजूद सभी लोग उसे खिलाएंगे, तो ध्यान दें कि बच्चे को हर व्यक्ति बस थोड़ा-सा ही खाना चटाए।

चूंकि, अन्नप्राशन संस्कार का समय बच्चे और उसके माता-पिता के लिए बेहद खास होता है। ऐसे में जरूरी है कि आपको इस बारे में सही जानकारी होनी चाहिए। इसके अलावा, कुछ मजेदार एक्टिविटी करके भी आप इस समारोह को और मजेदार बना सकते हैं।

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