Category Archives: रोचक तथ्य

जाने कौन थे बप्पा मौर्या ???

आस्था की एक अनोखी यात्रा पिछले 600 सालों से जारी है। इस यात्रा में करोड़ों भक्त शामिल हैं। हम बात कर रहे हैं करोड़ों गणेश भक्तों की, जो सालों से गणपति बप्पा मोरया के नारे लगा रहे हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर नहीं जानते कि मोरया असल में थे कौन?

पुणे से 18 किलोमीटर दूर चिंचवाड़ के इस इलाके का बच्चा-बच्चा मोरया की कहानी जानता है। मोरया गोसावी 14वीं शताब्दी के वो महान गणपति भक्त हैं जिनकी आस्था की चर्चा उस दौर के पेशवाओं तक पहुंची तो वो भी इस दर पर अपना माथा टेकने यहां तक चले आए। उन्हीं के नाम पर बना मोरया गोसावी समाधि मंदिर आज करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र है। पुणे से करीब 18 किलोमीटर दूर चिंचवाड़ में इस मंदिर की स्थापना खुद मोरया गोसावी ने की थी।

कहा जाता है कि 1375 में मोरया गोसावी का जन्म भी भगवान गणेश की कृपा से ही हुआ था। उनके पिता वामनभट और मां पार्वतीबाई की भक्ति से खुश होकर भगवान ने कहा था कि वो उनके यहां पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। यही वजह है कि मोरया गोसावी का जन्मस्थल भी गणेश भक्तों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है। बचपन से ही मोरया गोसावी गणेश भक्ति में कुछ इस तरह रम गए कि उन्हें दीन-दुनिया का कुछ ख्याल ही नहीं रहता। थोड़े बड़े हुए तो मोरगांव के मयूरेश्वर मंदिर में गणपति के दर्शन के लिए जाने लगे।

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इस मंदिर के निर्माण की कहानी बेहद रोचक है। कहते हैं कि मोरया गोसावी हर गणेश चतुर्थी को चिंचवाड़ से पैदल चलकर 95 किलोमीटर दूर मयूरेश्वर मंदिर में भगवान गणेश के दर्शन करने जाते थे। ये सिलसिला उनके बचपन से लेकर 117 साल तक चलता रहा। उम्र ज्यादा हो जाने की वजह से उन्हें मयूरेश्वर मंदिर तक जाने में काफी मुश्किलें पेश आने लगी थीं। तब एक दिन गणपति उनके सपने में आए।

चिंचवाड़ देवस्थान के ट्रस्टी विश्राम देव कहते हैं कि 1492 की बात है। 117 साल उम्र थी। मयूरेश्वर जी सपने में आए, कहा कि जब स्नान करोगे तो मुझे पाओगे। मोरया गोसावी जब कुंड से नहाकर बाहर निकले तो उनके हाथों में मयूरेश्वर गणपति की छोटी सी मूर्ति थी। उसी मूर्ति को लेकर वो चिंचवाड़ आए और यहां उसे स्थापित कर पूजा-पाठ शुरू कर दी। धीरे-धीरे चिंचवाड़ मंदिर की लोकप्रियता दूर-दूर तक फैल गई। महाराष्ट्र समेत देश के अलग-अलग कोनों से गणेश भक्त यहां बप्पा के दर्शन के लिए आने लगे।

मान्यता है कि जब मंदिर का ये स्वरूप नहीं था तब भी यहां भक्तों की भारी भीड़ जुटती थी। यहां आने वाले भक्त सिर्फ गणपति बप्पा के दर्शन के लिए नहीं आते थे, बल्कि विनायक के सबसे बड़े भक्त मोरया का आशीर्वाद लेने भी आते थे। भक्तों के लिए गणपति और मोरया अब एक ही हो गए थे।

पुणे शहर से करीब 80 किलोमीटर दूर मोरगांव के मयूरेश्वर मंदिर की स्थापना कब और कैसे हुई, इस बारे में कोई पुख्ता जानकारी तो नहीं मिलती, लेकिन इतना तय है कि मोरया गोसावी की भक्ति ने इस तीर्थ स्थल को सभी गणेश भक्तों के लिए अहम बना दिया है। मान्यता है कि अष्टविनायक के दर्शन की शुरुआत भी मयूरेश्वर से होती है और अंत भी यहीं होता है। अष्टविनायक यानी 8 गणपति। ये आठ मंदिर महाराष्ट्र के अलग-अलग इलाकों में हैं।

मयूरेश्वर मंदिर परिसर में पेड़ के नीचे मोरया गोसावी की मूर्ति भक्ति की एक अनोखी कहानी कहती है।  बताया जाता है कि एक बार चिंचवाड़ से चलकर मोरया गोसावी यहां तक आ तो गए, लेकिन आगे का रास्ता बाढ़ की वजह से बंद हो चुका था। तब पेड़ के नीचे बैठकर मोरया गोसावी ने मयूरेश्वर गणपति को याद किया और भगवान अपने भक्त को दर्शन देने यहां तक चले आए। यहां आने वाले भक्तों की जितनी श्रद्धा मयूरेश्वर गणपति में हैं, उतनी ही मोरया गोसावी में है। भक्त मोरया गोसावी को मयूरेश्वर गणपति का अवतार मानते हैं। भक्तों के मुताबिक यहां आकर उन्हें दोनों देवों के दर्शन हो जाते हैं, उन्हें मनचाही मुराद मिल जाती है।

कहते हैं कि मोरया गोसावी जी ने संजीवन समाधि ले ली थी, यानी जीते जी वो समाधि में लीन हो गए थे। भक्त मानते हैं कि आज भी मोरया गोसावी तीर्थस्थलों में मौजूद हैं। यही वजह है कि यहां गणपति के साथ-साथ मोरया की भी पूजा की जाती है।

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Navroz : Parsi New Year

पारसी धर्म का इतिहास और परंपरा :- 1380 ईस्वी पूर्व जब ईरान में धर्म परिवर्तन की लहर चली तो कई पारसियों ने अपना धर्म परिवर्तित कर लिया, लेकिन जिन्हें यह मंजूर नहीं था वे देश छोड़कर भारत आ गए। यहां आकर उन्होंने अपने धर्म के संस्कारों को आज तक सहेजे रखा है। सबसे खास बात ये कि समाज के लोग धर्म परिवर्तन के खिलाफ होते हैं।

पारसी समाज की लड़की किसी दूसरे धर्म में शादी कर लें तो उसे धर्म में रखा जा सकता है, लेकिन उनके पति और बच्चों को धर्म में शामिल नहीं किया जाता। ठीक इसी तरह लड़कों के साथ भी होता है। लड़का किसी दूसरे समुदाय में शादी करता है तो उसे और उसके बच्चों को धर्म से जुड़ने की छूट है, लेकिन उनकी पत्नी को नहीं। पारसी समुदाय धर्म परिवर्तन पर विश्वास नहीं रखते।

जिस प्रकार प्रत्येक वर्ष 1 जनवरी का दिन नव वर्ष के रुप में मनाया जाता हैं. ऐसे ही हर साल पारसी नव वर्ष मनाया जाता हैं. इस दिन को पारसी समुदाय के लोग तथा इण्डिया के लोग बड़े ही उत्साह से मनाते हैं | ऐसा माना जाता कि 17 अगस्त के दिन ही तीन हजार वर्ष पहले इरान के जरथुस्त्र वंश के शासक शाह जमशेद ने सिंहासन ग्रहण किया था. शाह जमशेद ने ही पारसी कैलंडर का निर्माण किया था. जिसे “शहंशाही” के नाम से भी जाना जाता हैं | पारसी समुदाय के अनुसार इस दिन पूरी कायनात का निर्माण हुआ था. इस लिए भी इस दिन को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता हैं |

पारसी नव वर्ष कैसे मनाया जाता हैं – पारसी समुदाय का यह त्यौहार उनकी एकता का भी प्रतीक माना जाता हैं. इसलिए इस दिन पारसी लोग नव वर्ष मनाने के लिए अपने घर पर अपने रिश्तेदारों को, मित्रों को तथा आस – पडोस के लोगों को निमंत्रण देते हैं तथा उनके लिए खास तैयारियां करते हैं. अपने घर को फूलों से तथा अन्य वस्तुओं से सजाते हैं. घर के मुख्य द्वार के बीच विभिन्न रंग के रंगीन पाउडर से प्रकृति के मनमोहक चित्र बनांते हैं |इस दिन घर को अंदर और बाहर से अच्छी तरह सजाने के बाद घर के सभी व्यक्ति नए कपडे पहन कर तैयार होते हैं और अपने महमानों का गुलाब जल छिडक कर स्वागत करते हैं |

इस दिन लोग अपने घर में एक मेज रखकर उस पर जरथुस्त्र की तस्वीर, फूल, फल, चीनी, धूप, अगरबत्ती, शीशा, मोमबत्ती आदि पवित्र वस्तुएं रखते हैं | पारसी परम्परा में यह मान्यता हैं कि इस दिन इन सभी वस्तुओं को मेज पर रखने से घर के सदस्यों की आयु में तथा घर के सुख – सौभाग्य में वृद्धि होती हैं | पारसी समुदाय में इस दिन पुलाव, सेवई, मूंग दाल का हलवा आदि स्वादिष्ट भोजन बनाकर अपने मेहमानों को खिलाया जाता हैं |

मेहमानों को स्वादिष्ट भोजन कराने के बाद सभी लोग इकट्ठे होकर पूजा स्थलों पर जाते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं. भगवान से प्रार्थना करने की यह विधि पारसी परम्परा के अनुसार “जश्न” कहलाती हैं |मंदिर से आने के बाद पारसी समुदाय के लोग गरीब लोगों को दान देते हैं. पारसी नव वर्ष में अग्नि देवता का भी विशेष महत्व हैं | इस दिन सभी लोग इकठे होकर आग जलाते हैं और उसमें चन्दन की लकड़ियों को डालकर अग्नि देवता का धन्वाद करते हैं तथा उनसे भी नव वर्ष को शुभ बनाने के लिए प्रार्थना करते हैं | अग्नि देवता से प्रार्थना करने के बाद सभी लोग एक दुसरे से मिलते हैं और उन्हें नव वर्ष की मुबारकबाद देते हैं |

नवराज़ या पारसी नया साल उन लोगों द्वारा मनाया जाता है जो ईरान, अफगानिस्तान, अज़रबैजान, जॉर्जिया, भारत, इराक, कज़ाखस्तान, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, रूस, सीरिया, ताजिकिस्तान, तुर्की, तुर्कमेनिस्तान और उजबेकिस्तान समेत देशों के निवासी हैं।

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