Category Archives: संस्कार

चूड़ाकर्म संस्कार

हिन्दू धर्म में स्थूल दृष्टि से प्रसव के साथ सिर पर आए वालों को हटाकर खोपड़ी की सफाई करना आवश्यक होता है, सूक्ष्म दृष्टि से शिशु के व्यवस्थित बौद्धिक विकास, कुविचारों के उच्छेदन, श्रेष्ठ विचारों के विकास के लिए जागरूकता जरूरी है। इस संस्कार में शिशु के सिर के बाल पहली बार उतारे जाते हैं। लौकिक रीति यह प्रचलित है कि मुण्डन, बालक की आयु एक वर्ष की होने तक करा लें अथवा दो वर्ष पूरा होने पर तीसरे वर्ष में कराएँ। यह समारोह इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि मस्तिष्कीय विकास एवं सुरक्षा पर इस सयम विशेष विचार किया जाता है और वह कार्यक्रम शिशु पोषण में सम्मिलित किया जाता है, जिससे उसका मानसिक विकास व्यवस्थित रूप से आरम्भ हो जाए |

चूड़ाकमर्, मुण्डन-संस्कार के माध्यम से किसी बालक के सम्बन्ध में उसके सम्बन्धी परिजन, शुभचिन्तक यही योजना बनाएँ कि उसे पाशविक संस्कारों से विमुक्त एवं मानवीय आदशर्वादिता से ओत-प्रोत किस प्रकार बनाया जाए?

मुण्डन का प्रतीक कृत्य किसी देव स्थल तीथर् आदि पर इसलिए कराया जाता है कि इस सदुद्देश्य में वहाँ के दिव्य वातावरण का लाभ मिल सके।

जिस छुरे से नाई सिर का मुण्डन करेगा, वह इन्हीं प्रयोजनों में काम आने वाला होना चाहिए। अच्छा हो, एक बढ़िया कैंची, उस्तरा तेज धार किया हुआ, शाखा या पुरोहित अपने पास तैयार रखें और उसे ही मुण्डन संस्कारों के काम लाया करें। प्राचीन काल में प्रथम केश उतारने का कार्य पुरोहित ही करते थे। अब उन्हें यह कला नहीं आती, इसलिए क्षौर कर्म नाई से करा सकते हैं। पर छुरा ऐसा ही लिया जाए, जो सवर्साधारण के उपयोग में न आता हो।

बालक और माता को यज्ञशाला से बाहर भेज देते हैं। यज्ञ मण्डप में क्षौर कमर् नहीं होता, इसलिए उसे बाहर भेजना आवश्यक होता है। समीप ही किसी स्थान पर बैठकर मुण्डन कराया जाए। मुण्डन करते समय अभिभावक तथा अन्य उपस्थित व्यक्ति मन ही मन गायत्री मन्त्र का जप करते रहें और भावना करें कि उनके द्वारा किया गया यह जप बालक के मस्तिष्क में सद्बुद्धि का प्रकाश बनकर प्रवेश कर रहा है। बालों को आटे या गोबर के गोले में बन्द करके जमीन में गाड़ देते हैं या जलाशय में विसजिर्त कर देते हैं। मुण्डन होने के बाद बच्चे को स्नान कराया जाए। बालों को गोबर में रखकर जमीन में इसलिए गाड़ा जाता है कि उनका भी गोबर की तरह खाद बन जाए।

‍मुण्डन किये हुए मस्तिष्क पर स्वस्तिक या ‘ॐ’ शब्द चन्दन अथवा रोली से लिखते हैं। यों तो यह लेखन कार्य संस्कार कराने वाले आचार्य कर सकते हैं, पर अच्छा हो, ऐसा कार्य किन्हीं सम्भ्रान्त सज्जन से कराया जाए। इससे उन्हें सम्मान मिलता है, उनकी रुचि और सद्भावना उस कार्य में बढ़ती है। अतएव छुट-पुट कार्य सदा उपस्थित लोगों में से किसी गणमान्य व्यक्ति से कराने चाहिए।

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अन्नप्राशन संस्कार

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अन्नप्राशन संस्कार का महत्वअन्नप्राशन से पहले शिशु केवल मां का दूध पीता है, इसलिए इस संस्कार का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि यही वह समय होता है, जब शिशु मां के दूध के अलावा, पहली बार अन्न ग्रहण करता है। अन्नप्राशन को लेकर संस्कृत में एक श्लोक भी है ‘अन्नाशनान्मातृगर्भे मलाशाद्यपि शुद्धयति’ यानी मां के गर्भ में रहते हुए शिशु में मलिन भोजन के जो दोष आते हैं, उसका निदान करना चाहिए और शिशु को पोषण देने के लिए भोजन कराना चाहिए। बात की जाए शास्त्रों की, तो इनमें भी अन्नप्राशन का महत्व माना गया है।

कब करना चाहिए अन्नप्राशन संस्कार –

अन्नप्राशन संस्कार शिशु के छह या सात महीने का हो जाने पर किया जाता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि छह महीने तक शिशु सिर्फ मां का दूध पीता है। इसके अलावा, सातवें महीने तक शिशु हल्का भोजन पचाने में सक्षम हो जाता है। ऐसे में छठे या सातवें महीने में अन्नप्राशन करना शिशु की सेहत के लिहाज से भी फायदेमंद होता है। हालांकि, कहा जाता है कि लड़कों का अन्नप्राशन जन्म के छठे, आठवें या दसवें महीने में किया जाना चाहिए, जबकि लड़कियों का अन्नप्राशन पाचवें महीने में किया जाना चाहिए।

अन्नप्राशन कहां करना चाहिए –

आमतौर पर अन्नप्राशन संस्कार मंदिर में या घर में किया जाता है। आप विशेष आयोजन करके भी अन्नप्राशन संस्कार को संपन्न करा सकते हैं। इसका चयन आप अपनी परंपरा के अनुसार कर सकते हैं। आपको बता दें कि केरल में लोग अपने बच्चे का अन्नप्राशन हिंदुओं के प्रसिद्ध मंदिर गुरुवायूर में कराते हैं, तो वहीं मध्य भारत और उत्तर-पूर्वी भारत में लोग घर में ही अन्नप्राशन संस्कार संपन्न कराते हैं।

कैसे किया जाता है अन्नप्राशन संस्कार –

अन्नप्राशन संस्कार की शुरुआत में बच्चे को मामा की गोद में बिठाया जाता है और मामा ही उसे पहली बार अन्न खिलाते हैं। पहला निवाला खाने के बाद परिवार के अन्य सदस्य बच्चे को अन्न खिलाते हैं, दुआएं देते हैं और बच्चे के लिए उपहार भी लाते हैं। इस दौरान बच्चे के सामने मिट्टी, सोने के आभूषण, कलम, किताब और खाना रखा जाता है। इनमें से शिशु जिस पर हाथ रखता है, उसी से उसके भविष्य का अंदा्जा लगाया जाता है। ऐसी मान्यता है :

  • अगर बच्चा सोने के आभूषण पर हाथ रखे, तो माना जाता है कि वह भविष्य में धनवान रहेगा।
  • अगर बच्चा कलम पर हाथ रखे, तो वह बुद्धिमान होगा।
  • अगर बच्चा किताब पर हाथ रखे, तो वह सीखने में आगे रहेगा।
  • अगर बच्चा मिट्टी पर हाथ रखे, तो उसके पास संपत्ति होगी।
  • अगर बच्चा खाने पर हाथ रखे, तो वह दयावान होगा।

अन्नप्राशन के दौरान बच्चे को कैसा भोजन खिलाया जाता है?

भले ही यह शिशु का पहला भोजन हो, लेकिन इस रस्म में बच्चे के लिए कई तरह के व्यंजन बनाए जा सकते हैं। हालांकि, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप किस क्षेत्र से हैं और किस समुदाय से हैं। इस दौरान नीचे बताई गई चीजें शिशु को खिलाई जाती हैं :

  • दाल, सांबर या रसम
  • खीर

अन्नप्राशन संस्कार समारोह आयोजित करने के लिए टिप्स

अन्नप्राशन बच्चे के लिए बेहद खास समारोह होता है, लेकिन इस दौरान सुरक्षा के लिहाज से कुछ सावधानियां बरतने की जरूरत होती है। नीचे हम आपको अन्नप्राशन संस्कार से जुड़े कुछ खास टिप्स दे रहे हैं, जो आपके काम आएंगे :

  • अन्नप्राशन के दौरान बच्चे को खिलाते समय हमेशा साफ-सफाई का खास ध्यान रखें। ऐसे में जरूरी है कि उसे खिलाने वाला हर व्यक्ति अपने हाथों को ठीक से धोए, ताकि बच्चे को इन्फेक्शन न हो।
  • इस समारोह से पहले बच्चे को अच्छी तरह सुला दें, ताकि समारोह के दौरान वो नींद से चिड़चिड़ा न हो।
  • हमेशा बच्चे को मुलायम, आरामदायक और ढीले-ढाले कपड़े पहनाएं।
  • इस बात का ध्यान दें कि बच्चे के आसपास ज्यादा भीड़ न हो। ऐसे में बस अपने खास मेहमानों को ही न्योता दें।
  • अगर ठंड का मौसम है, तो बच्चे का एक स्वेटर हमेशा साथ में रखें। अगर उसे ज्यादा ठंड लगने लगे, तो पहना दें। वहीं, अगर गर्मियों का मौसम है, तो बच्चे के सूती कपड़े अपने पास रखें, ताकि जरूरत पड़ने पर उसके कपड़े तुरंत बदल सकें।
  • हमेशा आसपास नैप्किन और टिशू रखें, ताकि बच्चे को खिलाने के बाद उसका मुंह साफ करते रहें।
  • इसके अलावा, बच्चे को बीच-बीच में आराम भी कराती रहें, ताकि उसे थकान न हो। थकान होने पर बच्चा चिड़चिड़ा हो सकता है।
  • इस दौरान, आप अपने बच्चे को धुएं वाली जगह से दूर रखें। इससे उसकी आंखों में जलन हो सकती है।
  • इस पल को यादगार बनाने के लिए तस्वीरों की एल्बम बनवाना न भूलें।
  • यूं तो भले ही यह रस्म बच्चे को अन्न खिलाने की है, लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि उसे इतना ज्यादा न खिला दें कि उसका पेट खराब हो जाए। चूंकि, समारोह में मौजूद सभी लोग उसे खिलाएंगे, तो ध्यान दें कि बच्चे को हर व्यक्ति बस थोड़ा-सा ही खाना चटाए।

चूंकि, अन्नप्राशन संस्कार का समय बच्चे और उसके माता-पिता के लिए बेहद खास होता है। ऐसे में जरूरी है कि आपको इस बारे में सही जानकारी होनी चाहिए। इसके अलावा, कुछ मजेदार एक्टिविटी करके भी आप इस समारोह को और मजेदार बना सकते हैं।

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