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अघोरी

अघोर पंथ, अघोर मत या अघोरियों का संप्रदाय, हिन्दू धर्म का एक संप्रदाय है। अघोर पंथ के प्रणेता भगवान शिव माने जाते हैं। इस पंथ का पालन करने वालों को ‘अघोरी’ कहते हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव ने स्वयं अघोर पंथ को प्रतिपादित किया था। अवधूत भगवान दत्तात्रेय को भी अघोरशास्त्र का गुरू माना जाता है। अवधूत दत्तात्रेय को भगवान शिव का अवतार भी मानते हैं। अघोर संप्रदाय के एक संत के रूप में बाबा किनाराम की पूजा होती है।

इसकी तीन शाखाएँ (१) औघर, (२) सरभंगी तथा (३) घुरे नामों से प्रसिद्ध हैं|

(१) औघर – इस शाखा में कल्लूसिंह वा कालूराम हुए, जो बाबा किनाराम के गुरु थे। कुछ लोग इस पंथ को गुरु गोरखनाथ के भी पहले से प्रचलित बतलाते हैं और इसका संबंध शैव मत के पाशुपत अथवा कालामुख संप्रदाय के साथ जोड़ते हैं। बाबा किनाराम अघोरी वर्तमान बनारस जिले के रामगढ़ गाँव में उत्पन्न हुए थे और बाल्यकाल से ही विरक्त भाव में रहते थे। इन्होंने पहले बाबा शिवाराम वैष्णव से दीक्षा ली थी, किंतु वे फिर गिरनार के किसी महात्मा द्वारा भी प्रभावित हो गए। उस महात्मा को प्राय गुरु दत्तात्रेय समझा जाता है, जिनकी ओर इन्होंने स्वयं भी कुछ संकेत किए हैं। अंत में ये काशी के बाबा कालूराम के शिष्य हो गए और उनके अनंतर कृमिकुंड पर रहकर इस पंथ के प्रचार में समय देने लगे। इनका देहांत सन् १८२६ में हुआ। बाबा किनाराम ने इस पंथ के प्रचारार्थ रामगढ, देवल, हरिहरपुर तथा क्रमिकुंड पर क्रमश चार मठों की स्थापना की जिनमें से चौथा प्रधान केंद्र है। इस पंथ को साधारणतः ‘औघढ़पंथ’ भी कहते हैं।

अघोरी कुछ बातों में उन बेकनफटे जोगी औघड़ों से भी मिलते-जुलते हैं, जो नाथपंथ के प्रारंभिक साधकों में गिने जाते हैं और जिनका अघोर पंथ के साथ कोई भी संबंध नहीं है। इनमें निर्वाणी और गृहस्थ दोनों ही होते हैं और इनकी वेशभूषा में भी सादे अथवा रंगीन कपड़े होने का कोई कड़ा नियम नहीं है। अघोरियों के सिर पर जटा, गले में स्फटिक की माला तथा कमर में घाँघरा और हाथ में त्रिशूल रहता है।

(२) सरभंगी – ‘सरभंगी’ शाखा का अस्तित्व विशेषकर चंपारन जिले में दीखता है जहाँ पर भिनकराम, टेकमनराम, भीखनराम, सदानंद बाबा एवं बालखंड बाबा जैसे अनेक आचार्य हो चुके हैं। इनमें से कई की रचनाएँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं और उनसे इस शाखा की विचारधारा पर भी बहुत प्रकाश पड़ता है।

(३) घुरे – अघोर पन्थ की ‘घुरे’ नाम की शाखा के प्रचार क्षेत्र का पता नहीं चलता |

अघोर साधनाएं – अघोर साधनाएं मुख्यतः श्मशान घाटों और निर्जन स्थानों पर की जाती है। शव साधना एक विशेष क्रिया है जिसके द्वारा स्वयं के अस्तित्व के विभिन्न चरणों की प्रतीकात्मक रूप में अनुभव किया जाता है। अघोर विश्वास के अनुसार अघोर शब्द मूलतः दो शब्दों ‘अ’ और ‘घोर’ से मिल कर बना है जिसका अर्थ है जो कि घोर न हो अर्थात सहज और सरल हो। प्रत्येक मानव जन्मजात रूप से अघोर अर्थात सहज होता है। बालक ज्यों ज्यों बड़ा होता है त्यों वह अंतर करना सीख जाता है और बाद में उसके अंदर विभिन्न बुराइयां और असहजताएं घर कर लेती हैं और वह अपने मूल प्रकृति यानी अघोर रूप में नहीं रह जाता। अघोर साधना के द्वारा पुनः अपने सहज और मूल रूप में आ सकते हैं और इस मूल रूप का ज्ञान होने पर ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है। अघोर संप्रदाय के साधक समदृष्टि के लिए नर मुंडों की माला पहनते हैं और नर मुंडों को पात्र के तौर पर प्रयोग भी करते हैं। चिता के भस्म का शरीर पर लेपन और चिताग्नि पर भोजन पकाना इत्यादि सामान्य कार्य हैं। अघोर दृष्टि में स्थान भेद भी नहीं होता अर्थात महल या श्मशान घाट एक समान होते हैं।

काशी को भारत के सबसे प्रमुख अघोर स्थान के तौर पर मानते हैं। भगवान शिव की स्वयं की नगरी होने के कारण यहां विभिन्न अघोर साधकों ने तपस्या भी की है। यहां बाबा कीनाराम का स्थल एक महत्वपूर्ण तीर्थ भी है। काशी के अतिरिक्त जूनागढ़ का गिरनार पर्वत भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। जूनागढ़ को अवधूत भगवान दत्तात्रेय के तपस्या स्थल के रूप में जानते हैं।

भ्रान्तिया – अघोर संप्रदाय के साधक मृतक के मांस के भक्षण के लिए भी जाने जाते हैं। मृतक का मांस जहां एक ओर सामान्य जनता में अस्पृश्य होता है वहीं इसे अघोर एक प्राकृतिक पदार्थ के रूप में देखते हैं और इसे उदरस्थ कर एक प्राकृतिक चक्र को संतुलित करने का कार्य करते हैं। मृत मांस भक्षण के पीछे उनकी समदर्शी दृष्टि विकसित करने की भावना भी काम करती है। कुछ प्रमाणों के अनुसार अघोर साधक मृत मांस से शुद्ध शाकाहारी मिठाइयां बनाने की क्षमता भी रखते हैं। लोक मानस में अघोर संप्रदाय के बारे में अनेक भ्रांतिया और रहस्य कथाएं भी प्रचलित हैं।

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Happy Halloween

हैलोवीन का त्यौहार हर साल अक्टूबर के आखिरी दिन यानि 31 अक्टूबर को मनाया जाता है | यह त्यौहार विदेशों में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है | वैसे तो इस त्यौहार में भी लोग ख़ुशी मनाते हैं और एक दूसरे को उपहार बांटते हैं साथ ही रंग बिरंगे कपडे पहनते हैं | लेकिन इस त्यौहार को भूत प्रेतों से भी जोड़ा जाता है इसलिए लोग इस दिन डरावने कपड़े और मुखोटे पहन कर पार्टी भी करते है |

हेलोवीन का त्यौहार सबसे अधिक यूरोप, अमेरिका और इंग्लैंड के साथ साथ दुनिया के दूसरे बहुत से देशों में भी मनाया जाने लगा है | लेकिन कहा जाता है इस डरावने त्यौहार को मनाने की परम्परा आयरलैंड और स्कॉटलैंड से शुरू हुई थी |

इस त्यौहार को मनाने के पीछे बहुत सी मान्यताएं है | जैसे की कुछ लोग मानते हैं कि ये त्यौहार केल्टिक के लोगों का साम्हिन त्यौहार है जिसमें वो लोग भूतों और बुरी आत्माओं से बचने के लिए डरावने कपडे पहनते थे और मोमबत्तियां जलाते थे | यूरोप के लोगों का ये भी मानना है कि इस दिन उनके पुरुखों की आत्मायें धरती पर आती है | जिस तरह भारत में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध मनाये जाते हैं उसी तरह से यूरोप में भी इसे अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति से जोड़ कर देखा जाता है | अमेरिका के लोग इसे कद्दू की कटाई से भी जोड़ कर देखते हैं | इसलिए इस त्यौहार को कद्दुओं का त्यौहार भी कहा जाता है | अमेरिका में रहने वाले लोग इस दिन बड़े बड़े कद्दुओं को काटकर उस पर डरावना चेहरा बना देते हैं और उनके अंदर मोमबतियां रख देते हैं |

हेलोवीन के कुछ रोचक तथ्य –

  • विदेशों में हेलोवीन क्रिसमस के बाद सबसे ज्यादा मनाया जाने वाला त्यौहार है |
  • अमेरिका में बच्चे इस दिन ट्रिक और ट्रीट मनाते है और पड़ोसियों के घर में जाकर बोलते है ट्रिक और ट्रीट | तब पडोसी उन्हें ट्रीट बोलकर उन्हें खाने के लिए चॉकलेट देते हैं |
  • ट्रिक और ट्रीट की शुरुवात केल्टिक लोगों ने की थी जिसमें वो अपने घरों के बाहर खाने पीने की वस्तुएं रखकर आत्माओं को बुलाते थे |
  • अमेरिका में हैलोवीन की शाम काली बिल्ली का रास्ता काटना अशुभ माना जाता है |
  • अमेरिका में माता पिता इस दिन बच्चों के कपड़ों पर लाखों खर्च करते हैं |
  • कुछ जगह इस दिन और पुरे अक्टूबर में आप बिल्ली नहीं खरीद या अडॉप्ट नहीं कर सकते क्यूंकि बिल्लियां बेचने वालों को डर रहता है कि कहीं इस दिन बिल्ली की बलि ना दे दी जाए |
  • कुछ लोग हेलोवीन को रोम के एक त्यौहार से प्रभावित मानते हैं जिसे पोमोना (Pomona) कहा जाता है जिसमें रोम की देवी की पूजा की जाती है | ऐसा इसलिए है क्यूंकि रोम ने 43 A.D में केल्टिक पर अपना अधिकार कर लिया था |

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