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Navroz : Parsi New Year

पारसी धर्म का इतिहास और परंपरा :- 1380 ईस्वी पूर्व जब ईरान में धर्म परिवर्तन की लहर चली तो कई पारसियों ने अपना धर्म परिवर्तित कर लिया, लेकिन जिन्हें यह मंजूर नहीं था वे देश छोड़कर भारत आ गए। यहां आकर उन्होंने अपने धर्म के संस्कारों को आज तक सहेजे रखा है। सबसे खास बात ये कि समाज के लोग धर्म परिवर्तन के खिलाफ होते हैं।

पारसी समाज की लड़की किसी दूसरे धर्म में शादी कर लें तो उसे धर्म में रखा जा सकता है, लेकिन उनके पति और बच्चों को धर्म में शामिल नहीं किया जाता। ठीक इसी तरह लड़कों के साथ भी होता है। लड़का किसी दूसरे समुदाय में शादी करता है तो उसे और उसके बच्चों को धर्म से जुड़ने की छूट है, लेकिन उनकी पत्नी को नहीं। पारसी समुदाय धर्म परिवर्तन पर विश्वास नहीं रखते।

जिस प्रकार प्रत्येक वर्ष 1 जनवरी का दिन नव वर्ष के रुप में मनाया जाता हैं. ऐसे ही हर साल पारसी नव वर्ष मनाया जाता हैं. इस दिन को पारसी समुदाय के लोग तथा इण्डिया के लोग बड़े ही उत्साह से मनाते हैं | ऐसा माना जाता कि 17 अगस्त के दिन ही तीन हजार वर्ष पहले इरान के जरथुस्त्र वंश के शासक शाह जमशेद ने सिंहासन ग्रहण किया था. शाह जमशेद ने ही पारसी कैलंडर का निर्माण किया था. जिसे “शहंशाही” के नाम से भी जाना जाता हैं | पारसी समुदाय के अनुसार इस दिन पूरी कायनात का निर्माण हुआ था. इस लिए भी इस दिन को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता हैं |

पारसी नव वर्ष कैसे मनाया जाता हैं – पारसी समुदाय का यह त्यौहार उनकी एकता का भी प्रतीक माना जाता हैं. इसलिए इस दिन पारसी लोग नव वर्ष मनाने के लिए अपने घर पर अपने रिश्तेदारों को, मित्रों को तथा आस – पडोस के लोगों को निमंत्रण देते हैं तथा उनके लिए खास तैयारियां करते हैं. अपने घर को फूलों से तथा अन्य वस्तुओं से सजाते हैं. घर के मुख्य द्वार के बीच विभिन्न रंग के रंगीन पाउडर से प्रकृति के मनमोहक चित्र बनांते हैं |इस दिन घर को अंदर और बाहर से अच्छी तरह सजाने के बाद घर के सभी व्यक्ति नए कपडे पहन कर तैयार होते हैं और अपने महमानों का गुलाब जल छिडक कर स्वागत करते हैं |

इस दिन लोग अपने घर में एक मेज रखकर उस पर जरथुस्त्र की तस्वीर, फूल, फल, चीनी, धूप, अगरबत्ती, शीशा, मोमबत्ती आदि पवित्र वस्तुएं रखते हैं | पारसी परम्परा में यह मान्यता हैं कि इस दिन इन सभी वस्तुओं को मेज पर रखने से घर के सदस्यों की आयु में तथा घर के सुख – सौभाग्य में वृद्धि होती हैं | पारसी समुदाय में इस दिन पुलाव, सेवई, मूंग दाल का हलवा आदि स्वादिष्ट भोजन बनाकर अपने मेहमानों को खिलाया जाता हैं |

मेहमानों को स्वादिष्ट भोजन कराने के बाद सभी लोग इकट्ठे होकर पूजा स्थलों पर जाते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं. भगवान से प्रार्थना करने की यह विधि पारसी परम्परा के अनुसार “जश्न” कहलाती हैं |मंदिर से आने के बाद पारसी समुदाय के लोग गरीब लोगों को दान देते हैं. पारसी नव वर्ष में अग्नि देवता का भी विशेष महत्व हैं | इस दिन सभी लोग इकठे होकर आग जलाते हैं और उसमें चन्दन की लकड़ियों को डालकर अग्नि देवता का धन्वाद करते हैं तथा उनसे भी नव वर्ष को शुभ बनाने के लिए प्रार्थना करते हैं | अग्नि देवता से प्रार्थना करने के बाद सभी लोग एक दुसरे से मिलते हैं और उन्हें नव वर्ष की मुबारकबाद देते हैं |

नवराज़ या पारसी नया साल उन लोगों द्वारा मनाया जाता है जो ईरान, अफगानिस्तान, अज़रबैजान, जॉर्जिया, भारत, इराक, कज़ाखस्तान, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, रूस, सीरिया, ताजिकिस्तान, तुर्की, तुर्कमेनिस्तान और उजबेकिस्तान समेत देशों के निवासी हैं।

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Rakshabandhan : पौराणिक कथा

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पौराणिक कथा 1 –  भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी होते नज़र आने लगे। भगवान इंद्र घबरा कर बृहस्पति  के पास गये। वहां बैठी इन्द्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी। उन्होंने रेशम का धागा मन्त्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बाँध दिया। संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। लोगों का विश्वास है कि इन्द्र इस लड़ाई में इसी धागे की मन्त्र शक्ति से ही विजयी हुए थे। उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बाँधने की प्रथा चली आ रही है। यह धागा धन, शक्ति, हर्ष और विजय देने में पूरी तरह समर्थ माना जाता है ।

पौराणिक कथा 2 –  स्कन्ध पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबन्धन का प्रसंग मिलता है। कथा कुछ इस प्रकार है- दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब भगवान वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा माँगने पहुँचे। गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी। भगवान ने तीन पग में सारा आकाश पाताल और धरती नापकर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। इस प्रकार भगवान विष्णु द्वारा बलि राजा के अभिमान को चकनाचूर कर देने के कारण यह त्योहार बलेव नाम से भी प्रसिद्ध है। कहते हैं एक बार बाली रसातल में चला गया तब बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया। भगवान के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय बताया। उस उपाय का पालन करते हुए लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षाबन्धन बांधकर अपना भाई बनाया और अपने पति भगवान बलि को अपने साथ ले आयीं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी।

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